तिनका नहीं उड़ा

क बार भगवती दुर्गा कि कृपा से देवताओ ने देवासुर  संग्राम में दैत्यों को पराजित कर दिया.देवता इस बात से अंजान थे कि भगवती के शक्ति के कारण ही उनकी विजय हुई है.वे इसे अपने बल पराक्रम की  जीत मानते हुए सभी लोको में अपनी शक्ति का बखान कर रहे थे.
                       देवताओ को अहंकार के नशे में चूर देख भगवती ने उन्हें सबक सिखाने का निश्चय

यज्ञ, दक्षिणा, फल

गवान श्री कृष्ण कि भक्त अनेक गोपिया थी,परन्तु उनमे से सुशीला  नामक एक गोपी उन्हें अत्यंत प्रिय थी.अपने नाम के अनुरूप सुशीला बहुत सुन्दर,सुशिल और बुद्धिमान थी.श्रेष्ठ गुणों एवं लक्षणों से युक्त होने के कारण उसकी तुलना देवी लक्ष्मी से कि जाती थी.उसने तन मन से स्वयं को भगवान श्री कृष्ण के चरणों में समर्पित कर दिया था.उसकी भक्ति और निष्ठां तीनो लोको में प्रसिद्द थी.चुकी श्री कृष्ण भी सुशीला से प्रेम करते थे, इसलिए भगवती राधा के मन में उसके प्रति इर्ष्या का भाव रहता था.
एक बार सुशीला भगवान् श्री कृष्ण के पास बैठ के प्रेमालाप कर रही थी.सहसा वह भगवती राधा आ गई

"मै तेरा काल "

राजा धर्मद्वज  का कुशध्वज नमक एक धर्मात्मा भाई था.उसका विवाह मालावती नामक युवती से हुआ.धर्मध्वज के भांति कुशध्वज भी भगवती जगदम्बा का अनन्य भक्त था .वह प्रतिदिन उनके मायाबीज मंत्र का जाप करता था.भगवती कि कृपा से कुशध्वज के घर एक सुन्दर कन्या उत्पन्न हुई.वह कन्या महालक्ष्मी का अंश थी .जन्म लेते ही वह कन्या वेद मंत्रो  का उच्चारण करते हुए सुतिकाग्रिः से बहार निकल आई.अतः विद्वानों ने उसका नाम 'वेदवती' रखा.
माता पिता के भांति वेदवती के ह्रदय में भी भक्ति का अथाह सागर उमड़ रहा था. युवा होने पर

किसे प्रणाम


राजा अनमित्र की पत्नी भद्रा ने एक ऐसे दिव्य पुत्र को जन्म दिया, जिसे पूर्व जन्म की सभी घटनाओ का ज्ञान था. इसी कारण वह बालक माता से कुछ अलग थलग रहता था . भद्रा ने उसे रिझाने के अनेक प्रयास किये, किन्तु असफल रही.अंत में क्रोधित होकर उसने बालक को वन में छुड़वा दिया.
                                वन में एक भयंकर राक्षसी  रहती थी .उसे बच्चो का मांस अत्यंत प्रिय था.लेकिन